Monday, 16 June 2014

जखम जो हम को मिले,उस का हिसाब किसी के पास ना था..दरद की इनतियाँँ मे

कैैैसे जिए,यह मलाल भी किसी को ना था..छाले हाथो मे हमारे भी पडे,पर उन के

फटने का एहसास किसी को ना हुआ..हम गुनाहगाऱ बने उनही नजऱो के,जिन के साथ

बरसो का आशिय़ाना रहा.....

Sunday, 15 June 2014

रासते बनाए जाते हैं अपने ईमान से,किसी के रासतों को काट कर नहीं...

डूबते सूरज को सलाम कोई नही करता,कया उस का वजूद नही होता..

रात ढलती हैं,एक नई सुबह को फिऱ लाती हैं..लेकिन इस बार उसी सूरज को..

यही दुनियाँ सलाम करती हैं..कयो कि यही ढलता सूरज एक नई रौशनी लाता है..

Saturday, 14 June 2014

नया सफर,नई ऱाहे..हर कदम है नया..कितना चलना हैै अभी,मालूम नहीं..

किसी के साथ नही,किसी के बाद नही..परवरदिगार के कदमोंं मे खत लिखा है..

किसी से कुछ सुनना नही,किसी से कुछ कहना भी नही..

बस अपने ही जमीऱ की आवाज सुने गे,औऱ अपने सफर को अनजाम दे जाए गे..
मनिजल की तरफ बढ रहे हैं,अपने मजबूत इरदों से..सब कुछ भूल कर...

जो  बरसो पहले खोया था,वो मुकाम हासिल करना है..सब कुछ भूल कर..

कोई भी मुकाम पाने केे लिेए,उमर का बँधन तो नही..

खुदा को साथ ले कर,अकेले निकल गए है अपनी ऱाहो पे..सब कुछ भूल कर..
हसरत थी उन रासतों पे चलने की,जिन का सपना हम देखते ही रहे...

कभी उस की कभी इस की खवाहिशों पे,वकत बरबाद करते ही रहे..

आज सजा रहे है उन सपनो को,खुद के खयालों से..

सहारे ना माँगे थे कभी,पर साथ दुनिया के चलते ही रहे...
जमीं पे पाँव रखा था,आसमान की बुलनदियों को पाने के लिए नहीं..

चल रहे थेे हकीकत में,राहों की धूल बनने के लिए नहीं..

मकसद था सही और इरादेे भी सही...

मनिजल आ गई खुद सामने,हम ने तो बुलाया भी नहीं..


उस ने कहा मै ही तेरी पहचान हूँ..तुझ से जुडी आईने की अह्म तसवीर हूँ...

तू जहां जहां रखे गी कदम..मै तेरा साए की ही तकदीर हूं..

मैने कहा बेशक तेरे साथ सात फेरो का साथ हैैं ...

पर वजूद तो मेरा..मेरी खुद की पहचान के साथ है....

Friday, 13 June 2014

हर जऱरा आफताब नही होता..तो हर सपना भी हकीकत मे तबदील नही होता..

हर कदम जो बढता है तरककी की तरफ,वो भी पूरा नही होता...

हम चल दे बेशक आसमाँ की तरफ,आसमाँ हम को बुला ले....

हकीकत मे एेसा नही होता.......

मेरी जिनदगी पननो पे लिखी एक दासताँ ही तो थी..

तुम आए और इन पननो को फाड़ दिया..

एक दसतक,एक साए ने पुकारा हम को..

यह बताने के लिए,कि हकीकत इन पननोे से कही आगे है.

Wednesday, 11 June 2014

बरसों के बाद तेरा मुझ को फिऱ से पुकारना,एक खूबसूरत एहसास ही तो हैं..

हम पे यकी करना,एक नए रिशते् को जताना यह पयार ही तो हैं...

तुम पे मिटने के लिए,अभी भी हम में जान बाकी है..

तुमहें पयार करने के लिए,अभी भी जजबात बाकी हैं...
हा तेरे बचपन की पयार की झलक आज भी मेरे आँगन में है..

उस मिटटी् मे तेरे चलने की खनक आज भी हैं..

हम औऱ तुम बचपन की उस नादानियों से आज दूर निकल आए है..

पर तेरी मेरी पाक मुहबबत को आज भी नही भूल पाए हैं..

Tuesday, 10 June 2014

फिऱ सुबह आई है..रात के अधेँरे को विदा कर के आई है..

कोयल की कूक सजा रही है इस नए सवेरे को...

देखो जगा रही है नींद मे सोने वालो को..

कौन इस कूक से जाग पाए गा,या सुुबह की नियामतो को हासिल कर पाए गा....
पल पल जो याद आए,हर चलती साँस जिस से पयार करे..

बेवजह ही जो जीने की वजह बन जाए..

बरसों पहले भी तू वजह था,और आज इस मोड पे भी..

जीने की वजह तू है...
 जीवन मे हमेशा दुखो मे जीते आए है,हर छोटी खुशी के लिए मोहताज होते आए है..

जब कभी खुशी आई तो साथ मे दुखो ने घेर लिय़ा,मेरे जजबातों को कही धकेल दिया..

जब कभी हँसी ने दसतक दी,जमाने ने हम से मुह फेर लिया...

अब थक गए है इतना कि खुद ही राहे बना कर..खुशी को ठूठ रहे है इतना...
हर दरद दुआ मे अगर बदल गया होता,तो खुदा की इस दुनिया मे कही दरद नही होता.

पर दरद की इनतिहाँ रही इतनी,कि इनसान ही पतथर का बन गया..

चाहने से गर खुशी मिलती,अपनों का पयाऱ मिलता,तो यह जहाँ इतना बुरा ना होता.

Monday, 9 June 2014

हर लमहा कुछ कहता है,तेरे मेरे पयार की दासताँ को गुनगुनाता हैं..

बहारें शिददत से फूल बरसाती हैंं,रोशन जहाँ को करती हैं...

बरसों बाद भी यही बहारें यही लमहें,दासताँ हमारे पयार की दोहराए गी..

तब पयार के पननों मे,यहीं मुहबबत फिर से मुसकुराए गी...
समनदऱ मे डूब जाए,ऐसा एहसास तो नही देखा..नदियों मे सिमट जाए ऐसा पयार

नही देखा..जिनदगी की दौड मे पयार हो जाए,ऐसा बहाव नही देखा..
फिजा मे तेरे पयार की महक आज भी है,यकीँ तेऱे पयार पे मुझे आज भी है..

तनहाईयाँ कितनी भी चली हो साथ मेरे,पर तेरे पयार का,तेरे खवाब का..

              साथ आज भी हैं....
किसी के पावोँ की आहट ने,सुबह की नींद से जगा दिया हम को..

एक एहसास किसी के आने का,सकून से भर गाया हम को..

पर नींद से जाग कर,हम ने तो मुहबबत को ही जगा दिया...

Sunday, 8 June 2014

बहुुत पास मत आना मेरे,कि जल जाओ गे..

बहुत दूर भी मत जाना,कि मर जाओ गे..

हर आहट पे देखना कही मेरा साया तो नही...

साए के पास मत जाना कि हर हाल मे मिट जाओ गे..

LAHAR...

Ak bahut bara sach hai ki sehat aur zindgi ka aapas mai bahut gahra sambandh hai.par aksar log es satya ko jaan kar bhi nahi jaan pate..par mayak ke liye yeh satya to us ke samne tha.janam se who viklang tha.dono pairo mai itni takat nahi thi ki who chal paye.us ka ak aur bhai tha,ak bahan,dono us se bare the..aur puri tarah sawasth the.mata pita aur bhai bahan ne behad pyar diya-seva ki.pita ka kahna tha,us ko kamjor mat hone do,es liye unho ne mayak se na sahanubhuti dikhai,na hi alag se pyar ka sailaab lutaya...mayak bahut acchi tarah janta tha ki pita ka maksad us ko uchai tak puchna hai.maa ke pyar ne hamesha us ka hosla baraya.pita har roj us ko ak cycle riksah se khud chorne jae.phir dopehar ko lene bhi jate.ghar mai sub se yahi kaha ki yeh dayitaw sirf whoi nibhaye ge..mayak par bhagwan ki itni kirpa thi ki who parai mai behad hoshiyaar tha-sawbhav mai itni namrata-sub se apnepan se bolna..ersha to dur dur tak us ke paas nahi thi..who har namumkin chese ko -apni mehnat aur apne ghar walo ki khas kar pita ki mehnat aur pyar ko --mumkin raasto mai badal dena chata tha.jeewan ka ak hi maksad le kar chalta ki who mata pita ka naam roshan kare ga.un sub ke pyar aur wishwaas ko duniya ki nazro mai itna roshan kar de ki yahi duniya us ke aage sar jhuka de ge..
                     Mayak ki didi ka janamdin tha.par sath sath ak khushi ka din aur bhi tha ki didi bahut acche anak le kar college mai utrin hui thi..zindgi  ki es khushi mai -mayak apni aur se didi ko kuch gift dena chata tha.par who to abhi parai kar raha tha aur us ki pocket money bhi itni nahi thi..ki who apni didi ke liye kuch khried sake.par dena to hai.....who bhi aisa ki subb hairaan ho jaye.kahte hai ki koshish aur himmat karne walo ki kabhi haar nahi hoti.us ne jo socha who kisi ashcharya se kam nahi tha.who unhi bejaan pairo se apni didi ke liye kuch karna chata tha.bus phir kya tha-----us ke paas sirf 9 din the.who raat ko akant mai baith kar apne pairo ko dahl bana kar -board par aari tirche linea khichta.do ghante ki apaar mehna ke baadwho apne bejaan pairo   se -jin mai sirf halki jaan thi,ak pyari se painting bannane mai safal ho gaya.jab who painting puri hui to khud mayak ki khushi ka koi thikana na raha..char din bache the--us ne ak aur koshish ki aur didi ke khayal ko man mai rakhte hue us ne ak khubsurat se painting banai aur sath mai neeche apna naam bhi likha.ab to mauak ko who char din bhi bahut jayda lagne lage.
                          Phir who din bhi aa gaya.ghar mai sub ne mayak ko us ki parai ke liye shabhashi de.par mayak ka dil to ander hi andar khushi se dhark raha ttha--jab didi ke liye birthday cake katne laga to mayak apni wheel chair par jaise bhagte hui apne kamre mai gaya aur sundar se paper mai lipti who painting-sub ke sam,ne behad pyar aur samman se apni didi ko bhet ki.didi aur sub log hairaan the ki mayak ne kya diya hoga ? mata pita bhai bahan ki utsukta dekhte hi banti thi.didi ne behad pyar se use khola.jab mayak ne un ko bataya ki who painting us ne apne inhi bezaan pairo se banai hai ---''par kaise ?'' subhi ak sawar mai bole.''aise'' kah kar mayak ne paas pare hui apne board  par apne pairo mai colour brush le kar sub ko yeh dikhaya ki us ne kaise yeh sub kiya,mata pita ke charan chu kar mayak ne un ka aashish to le liya-par sath mai mata pita ki ankho se bahte hui khushi ke ansu-us ko tohfe ke roop mai mile.aaj zindgi ka who sach samne ha ki mehna aur koshish ki jaye o sub aasan ho jaa hai.mayak ka bhvishaya un subhi se jayda ujjawal tha-jo sadharan insano ko bhi naseeb nahi hota.
                         Aaj mayak ki paintings desh videsh mai bikti hai--jis bacche ko log,rishteydaar bojh maan kar sire se nakar rahe the-whoi aaj man se us ki khushi mai shamil the.jaha tum agar haar maan lo,to yeh duniya tumhe neeche dhakel kar dubara dekhe ge bhi nahi.-------meri yeh kahani aap subhi ko yeh sandesh deti hai ki kabhi bhi apne us bacche ki bekadri mat karo,jo janam se viklang hai.majbur hai----aap pyar se,man se sath de ge,to yeh viklang bacche bhi ---aap ka naam roshan kar sakte hai.---teak mayak ki tarah-------------
चलते चलते बहुत दूर तक आ गए है हम..

हर पगडणडी,हर बहाव से दूर निकल आए है हम..

जब थक कर टूट चुके थे हम....

एक इशारा मिला देख तेरे पास है हम...
कागज के फूलों सा नही था इशक मेरा,हद से जो गुजर जाए सैलाब भरा इशक था मेरा

जहाँ जहाँ कदम पडे तेरे,वहा वहा हुसन ने जुदा किया अकस तेरा.....

Saturday, 7 June 2014

Blog pe mere sath jurne ka THANKSSSS









         Regargs
खुशी का मतलब यह तो नही कि सारे जहाँ पे जाहिर कर दे..

किसी ने जननत,इस धरती पे सकून का रासता बताया...

उस के वादे ने पयार का मतलब समझाय़ा...

या खुदा आज तो तेरी खुदाई पे ही पयार आ गया....
फिऱ वो चेहरा उस का वो हसँना,मुझे उसी पयार का एहसास दिला गया..

वो मिला मुझे बरसों बाद,पर जिनदगी का मतलब बता गया..

अब ना तोडू गा अपना वादा,खुशनुमा साँसें दे कर चला गया..

अब तो इनतजाऱ है उस का,जो मेरा हमदम बन कर रासता बता गया...

मौत एक एेसा सच,कि जिनदगी उस के साथ जुडी हैं..

जब भी जिनदगी चलती हैं,मौत बगल मे अपना लिबास पहने खडी रहती हैैं..

फिर भी इनसान यह यकींं करता हैं कि मौत का फरमान उस के लिए बहुत अरसे

के बाद आए गा..शुभ रात्री.कल सुबह हो या ना हो....आमीन
कोयल की कूक ने सुबह को रँगीन बना दिया..

रात भर की उदासी को खुशनुमा माहौल ही बना दिया..

चपपे चपपे पे छाई है,मिठास की वो बोली..

मुहबबत ही सजा गई चहकती हुई वो बोली...

Friday, 6 June 2014

दोसतों....मेरे मिशन मे मेरे साथ जुडने का शुकऱीया..

मेरी कहानियाँ,मेरी शाय़री,

मेरे जीवन का अह्म मिशन है....
जो किया..जितना भी किया.

अपने मन और आतमा से किया..

यह बात और है कि हमारी किसमत ने हमें ही..

गुनाहगार बना दिया..
कदऱ हो हर जजबे की,ऐसा कहाँ होता है..

अकसर इस दुनियाँ मे,मन से किए इन जजबातों को..

सिरे से नकार दिया जाता है.....
टुकडों मे बँट रही है जिनदगी..सुबह शाम की तरह,कही धूप कही छाँव बन रही है...

जिनदगी..रिशतों का मोल नही रहा यहा,कोई मिट रहा है तो कोई  मिटा रहा है....

 जिनदगी को यहाँ..बस  मायने बदल गए है यहाँ......

सिरफ दो वकत की रोटी का जुगाड भी ना था,तब भी साथ थे..

अपनी छत भी ना थी,तब भी साथ थे..औलाद का सुख भी ना था,तब भी साथ थे..

आज रोटी है,मकान है,औलाद है..तब भी साथ है...

पर कया आज ऐसी मुहबबत है..कया इन सब के बगैऱ रिशतेे टिक पाए गे .

       


पैसा सब कुछ तो नहीं इस जीवन मे,फिर भी तिजोरियाँ भरते है उमर भर लोग..

रूतबे को बनाने के लिए ,जीते है उमर भर लोग...पर अकसर भूल जाते है लोग...

कि मौत के फरिशते कभी रिशवत नही लेते....

Thursday, 5 June 2014

तेरी बेवफाई पे अब रोते नही है हम,किसी जख्म के नासूऱ बनने पर दुखी नही होते है

हम..जब से जाना है,तू वो शीशा है जो हजाऱो बारिशों मे रहता है...

पर किसी की सूरत का वजूद बनता ही नही है...
दुनियाँ मे बहुत कुछ एेसा होता हैं,जो दिखाई दे कर भी दिखाई नही देता..

हजाऱो परदो मे लिपटा,वो सच जो पता हो कर भी पता नही होता..

पर एक आँख है जो देखती है सब,वजूद पहचानती है सब..

तेरे मेरे करमों का लेखा जोखा,जानती है सब.....
जो दोसत दूर तक साथ दे,हर दरद मे हो साथ..दौलत शोहरत की बातों मे..

ना हो उस का विशवास,बस मन के दरद को जो पढ ले अपनी आँखों से..

कया इस जमाने मे मिलते है..एेसे सचचे दोसत..
मौत कब ले जाए गी हमे....

आऔ दोसतों आप सब को यह पैगाम दे जाए....


इनहीं पननों मे हमे याद करना,वकत कितना भी कय़ू ना गुजर जाए....
पलट कर देखना उस का,हमारी जिनदगी का कसूरवार हो गया...

धडकनों का यू चलना,दिल के बीमार होने का कसूरवार हो गाया...

एक दिल ही तो था,जो उस की एक नजऱ का तलबगार बन गाया...

Wednesday, 4 June 2014

किसी के डर से यह कलम ना रोक पाए गे,जब तक जिए गे हर मुददे पे लिखते जाए गे

ना जाने कब तक इन साँसों को चलाया जाए गा,जो यह कलम अकेले ना कर पाई..

वो इन टूटती साँसों का साथ कर जाए गा..
उसूलों से जो ना जोडते,जिनदगी अपनी,हर रिशता हमारा होता...

चाशनी मे भिगो कर लफजो को बनाया होता,तो जीवन कुछ और होता..

दौलत के दरवाजों पर,सर झुका देते गर हम...

तो यह जीवन हमारा,बादशाहों का खजाना होता.....
हर बार तो धोखा खाय़ा है,किसमत की लकीरों से हम ने...

पर अब हर बार नही खाए गे,दुनिया मे आने से पहले...

तेरा नाम अपने नाम के साथ हीं लिखवा कर लाए गे....
नजऱे झुका दी उस ने,मेरे दिल की उस आहट पर....

जहाँ जहाँ कदम पडे उस के,सजदे किए हमारी नफासत ने...

यह मुहबबत ही तो है साहिब,कि नजऱे तो आप की झुकती है....

पर दिल हमारा धडकता हैं.........
चापलूसी की दुनियाँ मे,मिलते रहते है एेसे बहुत से लोग...

जो बोलते है पय़ार के इतने मीठे बोल...पर मकसद तो है अनदर से...

कि आ तुझे बता .दू......तू है कौन....

Tuesday, 3 June 2014

 जहाँ मोल ही नही जजबातों का,जहाँ दरद ही मिल रहा है पुरानी बातों का...

दरद जब हद से गुजरने लगे,तब तनहाँ जीना ही नही...

निकल रहे है नई राहों पे,अपने अकेलेपन के सकून को साथ लिए....

मेरे दोसतों---आज फिर आप सब का शुकरीया करती हू----

मेरा साथ देने के लिए----

     हर गुजरते लमहे के साथ कहते है--हम ने तो राह चुनी थी,पर दोसतो..आप सब ने

तो इन राहों पे हमें चलना सिखा दिया---
                                 सलाम
                   
टुटते हुए सपनों को खाक नही होने दे गे अब हम..

कतऱा कतऱा कर के इस मुहबबत को फिर लौटा लाए गे अब हम..

सपनों को हकीकत मे बदलना,नामुमकिन तो नही अब..

पर हकीकत को खबाबों मे सजा लेना,यह जान गए है अब हम...
दो बूँद पानी की पयास ही,हमें उस कुए तक ले आई है.

जहाँ पे बँजऱ है यह जमीं,और ठेरों पतथर खाई है..

वजूद तो सिरफ पयास का है,कुआँ तो नाम की दुहाई है..

Monday, 2 June 2014

वो सामने था मेरे,पर जुबाँ तो खामोश थी..

हवाएँ थम सी गई थी,पर तूफान तेज था...

कहना चाहते थे दऱदे-ए-बयां...

कि दिल था बस खामोश था.....
इस दुनिया के लोग पयार का दम भरते है....

पर उसी की पीठ पीछे,उस के मरने की दुआ करते है....

नफरत को दबाते है,अपने आदाबों से.....

पर अपनी मुसकुराहट मे जहर का फन रखते है.....
 मेरे जाने से,मेरे राहों को बिखरने मत देना....

उन पे फूल चढा कर,उन को सजा मत देना....

रूह ने बना दी है,पननों पे सयाही की लकीरें....

टूटेगे कई दिल,पर अनजाम तो खुलने देना......... 
खामोशी ने तोडा है,दामन भीगी रात का..बूंद बूंद ओस ने बिछाया है बिसतर भोर का..

कुछ फूल बिछाए है रजनीगँधा की साँसों ने,सब मिला कर साथ दिया है.....

सुबह की बरसात ने......
एक आहट जिनदगी की फिऱ लौट आई है,किसी को खबर भी नही बस..

बिन बताए लौट आई है,साँसें चल रही है धीमे धीमे...

पर बहारे खुशी से लौट आई है......

SHITEEZ KE US PAAR...........

Jaha dur dur tak ghatiyo mai ---na koi halchal thi,na kisi jeewan ke hone ki asha...kudrat ke es faisale par samajah nahi aa raha tha ki jaha kal tak hasti khelti wadiyo mai ----jeewan mahak raha tha,jharno mai jal ka dhimaa parwah apni gungunati aahat ka sandesha de raha tha...hum aksar bhul jate hai  ki anat ak nishchat parkriya hai..jeewan ka who satya-----jaha par pahuchana ----jaha tak samajahna-----har kisi ke liye sambhav nahi hai....jeewan ka moh tor kar-----us se juri tamam zindgiyo ko chor kar ----aage barna---bus barte hi jana---ak lakshay ko pane ke liye---lagan sheel hona----sakalap sheel hona----ak insaan ki pahchaan hai.....aise insaan ki pahchaan----jise us ke apne bhi es liye chor dete hai ki ab who doulat heen hai,un ke hisab se who ab buddi heen hai----aur sub se bara who ab umar heen hai-----matlab yeh ki who yani us ki umar ko jhelna un sub ke liye ak trasadi hai---- 
                                    Ha --har subah hum sub ke liye hamesha se ak sandesh le kar aati hai ki udho-------
jeewan ki chunotiyo ko savikaar karo----un se dar kar jeena nahi choro----un se dar kar bhago bhi nahi-----bus behad khamoshi se en ko apnao...jo shakti,jo takat moun mai hoti hai-----who jayda bolne mai nahi----kisi se uljahne mai bhi nahi----hamare antarman ki takat who takat hoti hai--jo hamare shant rahne par----hume sari pareshaniyo se nikalne ki---un se bahar aane ka raasta dikhti hai....kahte hai sache pyar mai bahut takat hoti hai-sirf sache pyar mai.who pyar jaha na lalach hota hai paiso ka ---na jameen jaydaad ka---par kya pyar aur chahat waha kaam aati hai,jaha hume neeche dhakalne wale insaan mojud hai----jaha hume kadam kadam parbeizzat karne wale shaksh mojud hai---yaha par sirf koshish ki ja sakti hai...par sirf utni jaha par hume lage ki who es chahat,es pyar ke layak hai bhi ya nahi -- 
                                      Phir ak mukaam aisa aa jata hai ki enhe bilkul chor dena hota hai--ak dum sire se nakar dena hota hai--Bhagwan ko diye har vachan ko nibhana--hamare andar ke insaan ki parakh hoti hai.ak aisi parkh,jo hume acche bure ki pahchaan dikhati hai..jeewan sirf khana peena sona hi nahi-----jeewan ka taatparya sub ke liye alag alag haikisi ki galat soch ko badalna--us ko jeewan ka mulay samjahna--khud apne liye kisi bevkufi se kam nahi hai. aaj adhikaansh logo ke jeewan ka mulay paisa hai,,jeewan kiwho  who tamam sukh suvidhai hai,,jin se who apne apne rishto ka mulay aaktey hai..Geeta aur Ramayan ke who tamam path-tamam shalok ab simit jagah,simit aasthao par aa chuke hai..bus en logo se taal mail tabhi baraya ja sakta hai,jab hum un ki haa mai haa,naa mai naa,aur un ke isharo par udh baith sake..
                                        Bachpan ki masum dahleej par-bau jee ki who parathanai-satsang mai ja kar veer jee ke who saaf suthre parvachan-jaise man ki diwaro par chipak kar rah gaye hai...veer jee ka kahna aaj tak yaad hai aur khas kar en halato mai,man ke andar shor dalta hai..ki agar tum sahi ho-sache ho,to ak dum moun rahna.khamoshi se jee lena-munasib ho jaye ga..insaan ki sahan shakti ka faisla,inhi halato mai hota hai-jab whoi log jinhe hum apna hone ka dawa karte hai-who hi hume dukh dard dete hai,aur khud ko sahi hone ka dum bharte hai....geeta ka sach--ramayan ke bol------jeewan ka sach sub kuch bhula kar,khud ko ishwar ke samarpan mai hai---dher ya saber----sub ko wahi jana hai.jaha sub ke karmo ka khata khola jata hai--jaha sub ke paap punay ki file kholi jati hai
                                         Paisa aur rutba--chalaki aur dagabaziya---sirf insaano ki farebi duniya mai hoti hai...jo jeewan jiya-jitna jiya--jo man aur aatma se en ke liye kar diya---who sub bhul kar aage bar chuke hai...jeewan ka shaswat satya hai yeh----jis jagah aaj hum hai-kal yaha koi aur tha--aur ab jo jagah hum chor de ge,who phir kisi aur ki ho jaye ge...bus fark sirf soch ka hai...
                                             Maan sammaan dusro ne diye,es samaj ne diye----par apno ne nahi diye,to kya hua ????? hum shayad un ki soch mai shamil nahi the--hum un ki soch mai ab shamil hona bhi nahi chate.kuch aise hai,jo kahne ko apne to nahi hai,par unho ne hamare ashisho ko,hamari duao ko apni zindgi bana liya hai...bus kahi dur ---bahut dur koi hume bula raha hai---bahut pyar se------shiteez ke us paar.....

Sunday, 1 June 2014

सुबह का वादा .. जो चल रहा है उस को चलने दो..

ठीक वैसे जैसे कोई चाहे...

पर तुम वो करना जो अातमा से वादा किया है........

औऱ जिस वकत तक किया है......
                                              आमीन
mujhe har haal mai,aage jana hai....

bachpan ke es shook ko pura karna hai...

koi hai jis ko wada kiya hai,es khawab ko pura karne ka...

phir yeh karwa bhi to ab sath mere hai....

              sukhriya dosto....

RUFTAAR..... .

Gilee reth par pavo ke nishan..dur tak chalne ke nishan....vibha un pavo ke nishno ko bahut acchi tarah pahchanti thi...kyu ki who us ke wajud ko acchi tarah ander tak janti thi..barso ke ahsaas se--barso ki yaddo ke--phir barso ki apni aatma ki awaz mai dabe hui--us chare ko andar tak janti thi..koi kuch bhi kahe--who ak aurat ke sath sath --ak who shakshiyat thi--jise khud se--khud ke liye insaaf karna atta tha.ha..who gilee reth par pairo ke nishan ------vibha beman se udhi aur baramade mai aa kar baith gaye..barish ke jane ke baad us ke gilee ahsaas ko mahsus kar rahi thi...aaj puranmasi hai...ha us din bhi puranmasi thi..kaise bhul sakti hai,jeewan ka who sach-------vivek-- us ka sarvang,jo us ke liye jeewan ka who sach tha,jo us ko vibha ko,us ki kamjori ke bawjud bhi pyar karta tha..achanak vibha ki ankho se ansu chalak aaye.apne sharir ke ander ke chipe sach--chipi kamjori ko mahsus karti hui,who din yaad aaya,jab who sach un dono ke samne aaya tha....
      Vibha ne vivek se prem vivah kiya tha.pyar ka iijhaar vibha ne mandir ki dalheej par kiya tha.kaisa sanyog tha || vivek aksar mandir atta tha aur vibha to roj hi jai thi.na jaan na pahchan,par shayad kudrat ke khel kaha kab kis ko mila de,koun jane....yaad kiya mandir mai puranmasi ki aarti ke waqt ,dono paas paas khare he.bhir bahut jayda thi,logo ki dhakka mukki ke beech---who dono kab sath khare ho gaye,kisi ko pata nahi chala dhayan tab tuta,jab pandit jee ne aarti ke waqt dono se yeh kah diya ki bhagwan satyanarayan tum dono ki jori banai rakhe.bahut pyari jori hai.aur vibha ke sar par hath rakh kar us ko sada suhagan hone ka aashirwaad de dala.achkacha kar vivek ne vibha ko dekha to vibha ka chara sakte mai tha.parsaad le kar jab who bahar nikle,to pahli baar dono ne ak duje ko dekhaphir dono apni apni ruftaar se gujar gaye.ha par dono ke dimag mai ak kashamkash thi.dono raat bhar so nahi paye.phir es ke baad kuch din vibha mandir nahi ja paye. apni car se chalte hui ,ak nazar mandir ko bahar se dekh leti.aur vivek us ka dimag to suhnay tha..par itna sachet jarur tha ki who vibha ko dundh raha tha..kyu ? kis liye ? udhar vibha ka dimag bhi suhnaytha--par sachet itna jarur tha ki vivek se milne se katra raha tha..par kudrat ka faisla kab kaha de jaye---- koi nahi janta...kai dino baad dono phir mile..mandir ki sarak jaha khatum hoti thi waha..dono aamse samne the----nishaband....bahut dher ke baad --vivek hi bola...''kaisi ho' vibha ne bahut dher baad soch kar kaha 'mai teek hu,aap kaise hai ?' phir ither uthar ki baato ke baad,vivek ne us se mandir na aane ka karan pucha.'' tabiyat teek nahi hi '' vibha ne palke jhuka kar kaha...'' kyu kya hua ?'' vivek chintit tha. '' yu hi kuch khas nahi '' vibha phir chup ho gaye....ghar aa kar dono hi samajah nahi paye ki koun si dor hai,jo un ko kheech rahi hai..par waqt ki aisi ruftaar ki pandit jee ne--vivek ki mata jee ko shikayat ki----ki aap ne apne bete ki shadi mai mujhe nayota kyu nahi diya ???? maa choki ''pandit jee abhi shadi kaha??? ladki to aap ko dhundni thi '' ''phir who koun thi '' pandit jee ne sari baat vistaar se batai..maa ki anbhavi ankhe us ladki ko dekhna chati thi..kisliye ?? waqt ki ruftaar ne kadam badai aur pandit jee ki galatfahmi ne maa ko un ki bahu dila di..aur vivek ko pa kar vibha nihal ho gaye..shadi ke do saal kab udh gaye,pata hi nahi chala..maa chati thi ghar mai kilkariya gunje.waqt ki ruftaar ak baar phir gujar rahi thi..char saal phir nikal gaye.maa nirash ho chali thi..vivek maa ke kahne par vibha ko le kar doctor ke paas gaya..''yah kabhi maa nahi ban sakti'' doctor ki awaz ne un dono ko hila diya..vivek es liye dukhi nahi tha ki vibha maa nahi ban sakti.bus who to vibha ko dekh kar hi dukhi tha...aur maa us ka kalejakaap udha..waqt ak baar phir ruftaar se udha aur phir dus saal baad ja kar ruka..maa es douraan es duniya se chal basi.vivek vibha ki duniya mai maa bahut aham thi.phir un ka who intejaar ----kilkariyo ka  intejaar ----vivek aur vibha ko rula rula jata...vivek ko vibha se koi shikayat nahi thi...bus who to hamesha ki tarah --us ke jeewan mai--khushiyo ke rang bharna chata tha--par vibha ke andar ka tufaan --us ko kachot raha tha..who vivek ki maa ka sapna pura jo nahi kar paye thi...so aksar udas ho jati thi..panch saal ka lamba waqt phir nikla.vivek ke paas sub kuch tha...vibha--ak pyari se patni--ak safal gharani...who kisi bhi kimat par vibha ko khush dekhna chata tha...aur vibha bhi apni kamjori --apne dukh ko khud mai dafan kar--vivek ko har tarah khush dekhna chati thi.
              phir ak baar vibha ki nazar,us gelee reth par pare pavo par pari...ansu ki bunde us ke galo par latak aaye.ha who barish ki bundo ke ander apne ansuo ko milati rahi..itna milati rahi ki kab us gelee reth par ---ak baar phir pavo ke nishan aate dikhe..par ab barish ki ruftaar tez ho rahi thi.aur es ruftaar ke sath sath us gelee reth par---who pavo ke nishan ---jo us ke vivek ke the...aa kar us ke pavo se mil gaye..ak masum se puchi--us ke galo pe hui---par who vivek ki nahi thi....vibha ki nazre udhi aur who haairaan thi...waqt ki es ruftaar ne  un dono ke pariwaar ko pura kar diya tha.vivek ka yeh chokane wala waqti ruftaar us ko,us ki vibha ko-----masum bacchi dila gaya... jo vivek us ke liye anathalaya se laya tha...
              vibha waqt ke faisle se bahut khush thi.bahut khush....Bhagwan ka sukhriya ada karti hui,,,who vivek aur masum kali ke sath jeewan ke rangeen sapne bunne lagi.....
वो एहसास तेरे छूने का,रूह मे अब तक कायम है....

बरसों बीत गए है साहिल,दरद आँखो मे अब भी कायम है....

कौन कहता है तू दूर है मुझ से....

एक जहान् औऱ भी,जहाँ तेरा इनतजार अाज भी कायम हैै...
वो एहसास तेरे छूने का,रूह मे अब तक कायम है....

बरसों बीत गए है साहिल,दरद आँखो मे अब भी कायम है....

कौन कहता है तू दूर है मुझ से....

एक जहान् औऱ भी,जहाँ तेरा इनतजार अाज भी कायम हैै....
उस चेहऱे मे कुछ था एेसा,कि दिल ने कहा....य़ही है वो.....

उस आवाज मे ऐसी थी खनक,कि दिल ने कहा....यही है वो.....

रूह से निकली यह सदा,तू मिल गया है मुझे एक अरसे के बाद...

दुनिय़ा ना पहचाने,मगऱ मेरी रूह ने कहा....यही है वो......