Sunday, 12 November 2017

तेरी हर ज़िद को पूरा करते आए है...तेरे दिल को कही ठेस ना पहुंचे,इस का ख्याल भी रखते आए है 

कभी यह ज़िंदगी जो दे गई दग़ा,साँसों का यह पहरा जो हो गया जुदा...पलक झपकते ही तुझ से दूर

हो जाए गे....तेरी बाहो मे सिमटने का सुख फिर ना पाए गे....तुझ से जुदाई के एहसास भर से रूह

मेरी डर जाती है...इसी लिए तेरी ज़िंदगी को सकून देने के लिए,तेरे हर अरमान को पूरा करते आए है  

Saturday, 11 November 2017

शुक्रिया ना करू ..इबादत भी ना करू...तेरी तारीफ़ मे मेरे मालिक गर सज़दा ना करू....यक़ीनन इस

ज़िंदगी का कोई मायने ही नहीं होगा...दौलत मिले या शौहरत मिले या ज़माने की हज़ारो खुशिया भी

क्यों ना मिले....तू अगर मेरे साथ नहीं,तेरा मेरे सर पर अगर हाथ नहीं..क्या करू गी इन तमाम चीज़ो

का...तेरी पूजा का अगर वरदान मिले,तुझे दिल मे बसाने का बस एक ख्याल मिले तो मेरे दाता,इस

जीवन मे इस से बड़ी नियामत और क्या होगी...अब भी तुझे याद ना करू तो यह ज़िंदगी कुछ नहीं होगी...

Friday, 10 November 2017

तेरे नाम से जीते,तेरे नाम से ही मर जाते...तूने जो ज़रा सा अपना माना होता,खुदा की कसम सब

कुछ छोड़ देते....हसरते बहुत जय्दा तो ना थी,गुलामी की ज़ंजीरो की वो सजा तो ना देते...तेरे चेहरे

की वो नमी,तेरी आँखों की वो हसी...तेरे ही आगोश मे रफ्ता रफ्ता वो जीने का सिला...उन खूबसूरत

लम्हो की इंतज़ार लिए,तेरी ही चौखट पे सर रख देते...यक़ीनन...तूने हम को जो दिल से चाहा होता

कसम खुदा की सब कुछ पल मे ही छोड़ देते....

Thursday, 9 November 2017

हर छोटी बात पे अक्सर रो देते थे हम...बिना कोई खता किए ही उसे अपनी खता मान लेते थे हम

ज़माना करता रहा गुस्तखियाँ हम से,और नादानी से भरे उस को अपनी किस्मत मानते रहे हम

अक्सर अकेले मे बेवजह उन्ही दुखो को झेलते रहे हम,जो गुनाह कभी किए ही नहीं..उन के इलज़ाम

भी सहते रहे हम..जब थका दिया इन दुखो ने,तो बस बगावत पे ही उतर गए हम...आज यह आलम

है दुखो से पूछते है....कौन हो तुम ? तुम को छोड़ कर अपनी छोटी से दुनिया मे अब  बस गए है हम....

बहुत ही ख़ामोशी से वो लिख रहे थे नज़्मे हमारी वफाओ पे...घंटो मसरूफ थे हमारी ही दास्ताँ लिख

रहे थे,हमारी नज़रो से दूर हमारी ही अदाओ पे....हम से नज़रे मिली तो ख़ौफ़ज़दा क्यों हो गए,क्यों

पन्नो को छिपाया और बेहद खामोश हो गए....इकरार तो कभी खुल कर किया नहीं,हम से बाते वफ़ा

की कभी की नहीं..माशाअल्लाह....तेरी मुहब्बत की यह खामोश अदा,हम तो यू ही मर मिटे है तुम पे

पन्नो का हिसाब नहीं,नज़्मों की कोई बात नहीं..बस हम ज़िंदा है तेरी इसी लियाकत के लिए...

Wednesday, 8 November 2017

यू तो तेरे लिए दुनिया अपनी छोड़ आए है...बेख़ुदी मे बढ़ाया जो हम ने कदम,यक़ीनन ज़माने को ही

मात दे आए है....नक़्शे-कदम पे तेरे चलने के लिए,तेरी ही  राहो मे तेरा साथ देने चले आए है...खुद्दार

बहुत है लेकिन यकीं तुझ पे कर के,फिर भी तेरी ज़िंदगी मे तेरे हमसफ़र बनने चले आए है....बदल गई

किसी रोज़ जो  निगाहे तेरी,टूटे गे बहुत बहुत मगर...अपनी इसी खुद्दारी को साथ लिए इसी दुनिया को

छोड़ जाए गे...

Tuesday, 7 November 2017

तुझ से गिला क्या करू,कोई शिकायत भी कैसे करू....हर कदम पे ले रही ज़िंदगी इम्तिहाँ मेरे....दर्द

को खुद मे समेटे हुए,लबो पे मुस्कराहट का लबादा ओढे हुए...कभी जिए इस के लिए तो कभी जिए 

उस  के लिए....सपने कुर्बान करते रहे, कभी किसी की ज़िद के लिए तो कभी किसी की ख़ुशी के लिए ...

खुद के लिए हम कब जिए...खुद के लिए हम कब हॅसे...ढूढ़ते रहे लम्हे अपने लिए...साँसों की डोर

टूटे कभी,इस से पहले खुदा को याद कर बस शुक्रिया कहे...सिर्फ शुक्रिया ही कहे......